Wednesday, November 9, 2016

शिक्षक का सम्मान कहाँ गया?

मेरा एक और सवाल है। टीचर का सम्मान कहां गया। बचपन से हर बच्चे को सैकड़ों बार रटाया जाता है- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय। बलिदारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय। जिस बच्चे ने लिख दिया, वह 2 नम्बर पा गया। इसमें उसने मीनिंग लिख दिया कि कबीर दास जी ने क्या कहा है, उसको 10 में से 10 नंबर मिल गए। उसे समझ में नहीं आया कि गुरु का क्या सम्मान करना है? कैसे सम्मान करना है?

जितने भी अफसर बैठे हैं उन सबने ‘गुरु गोविंद…’ पढ़ा हुआ है। सबने ये लिखकर एग्जाम में नंबर पाए हैं। लेकिन अकसर होता है कि उनके दफ्तरों के बाहर गुरु यानी टीचर्स धक्के खाते रहते हैं। उनके सामने कोई टीचर आ जाता है तो वह शिक्षा विभाग का कर्मचारी दिखता है, गुरु नहीं।

क्यों नहीं दिखता? क्योंकि जब पढ़ाया गया था तो ‘गुरु गोविन्द..’ समझने के लिए नहीं पढ़ाया गया था। माक् र्स लाने के लिए पढ़ाया गया था। वो माक् र्स ले आया। अफसर बन गया। अब कबीर की क्या जरूरत है। अगर कबीर रटाया नहीं गया होता, समझाया गया होता, कबीर के आइने में मुझे मेरी अपनी तस्वीर देखने का अभ्यास कराया गया होता तो कबीर हमेशा साथ देता।

No comments:

Post a Comment